क्यूँ इतनी नफरत थी मुझमें,
क्यूँ इतनी दर्द में जिया मै,
क्यूँ इतनी आग थी मुझे में,
क्यूँ घूट जहर के पिया मैं।
कभी न साथ दिया इस ज़िन्दगी ने,
पर न कभी किसी से शिकवा किया,
दर्द के शोलो पेय चला मैं,
पर हंस कर वो दर्द भी सहा।
खुशी की तलाश में मारा मारा फिरा,
इस तलाश में अपनी,कई बार संभला,कई बार गिरा,
पर न मिली खुशी और न मिले तुम,
एक बार फिर अपनी सवालो के साथ मैं,खड़ा गुमसुम।
अगर तू है कहीं खुदा,
तोह बस इतना सा जवाब देदे,
क्या मुझे नही था हक्क खुश रहने का,
चल,बस मेरे गमो का ही तू हिसाब देदे.
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