Thursday, February 3, 2011

कुछ सवालों के जवाब ढूंढे, कुछ तुम ढूँढो,कुछ हम ढूंढे

हर तरफ क्यूँ मायूसी का साया है ? ,
दर्द के आगोश में क्यूँ यह वक़्त आया है ? ,
थम सी क्यूँ गयी है सबकी ज़िन्दगी ,
समय ने यह कैसा खेल दिखाया  है ?

हर सवाल से निकल रहे ,
कुछ  और नए सवाल है ,
जवाब ढूँढने में,
ज़िन्दगी यह बहरहाल है,

कुछ जवाब तुम ढूँढो,
कुछ जवाब हम ढूँढेंगे,
सवाल- जवाब की इस आँख मिचोली में ,
न जाने कितने राज़ खुलेंगे,

शायद उन जवाबो से ,
यह मायूसी का साया घटेगा,
राज़ों के खुलने से,
दर्द का एहसास घटेगा,

पर वो एक राज़ है ,
जो न कोई ढूँढ पायेगा,
दफन है सीने में मेरे,
मेरे साथ ही दफन हो जायेगा.

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