Wednesday, August 12, 2009

पर न जाने क्यूँ?

हर खुशी नज़राने में आती है,
कुछ नए ख्वाब दिखाती है,
पर जब लगने लगती है अपनी सी,
नज़रे बचाकर साथ छोड़ जाती है,

पर जाने क्यूँ?

कभी खुशियों से भरा होता है दिल,
और आँखें नम पड़ जाती है,
कभी गम में डूबा होता है दिल,
फिर भी लबों पे एक हँसी खिल जाती है।

पर जाने क्यूँ?

कभी तोह तनहा राहों जा शोर ,
तोह कभी भीड़ में भी अकेलापन,
कहीं कभी किस्मत का वक्त पे ज़ोर ,
एक अजीब सा दर्द दे जाती है।

पर जाने क्यूँ?

पर अब इन सवालो का जवाब ढूँढने निकल पड़ा हूँ,
अकेला इन तनहा राहों पर चल पड़ा हूँ,
जो जवाब मिले तोह ठीक होगा,
नही तोह इस सवाल को भी ख़ुद में समेटे खड़ा हूँ।

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