क्या करें इस बावरे मन का ,
कैसे इसे समझाए,
एक पल है यह कुछ चाहता,
दूजे पल कुछ और यह चाहें,
पलके झपकने से पहले बदल जाती है इच्छाएं,
कुछ सोच सकें ,उससे पहले बदल जाती है तम्मानाएं,
कभी तोह चाहे चूम लूँ इस आकाश की उचाई को,
कभी चाहे छु लूँ सागर की गहराई को,
कभी चाहे ,हर इच्छा को सच करके दिखाऊँ,
कभी चाहे ,हर सपने को सच से रूबरू करा दूँ,
असीमित है इच्छाएं पर,सीमित जहाँ है,
रुक जायें हम कहीं, इतना समय ही कहाँ है,
बस में नहीं था मन ,तभी तोह तुमसे प्यार हुआ,
हर पल इन नजरो को तेरा ही इंतज़ार हुआ,
पर यह समय और मन भी अजीब खेल दिखाता है,
हर ख्वाब के सच होने का ख्वाब दिखाकर,
नजरों के सामने ही उन्हे तोड़ जाता है,
अब न कुछ कह सकूँगा,
अब न कुछ लिख पाउँगा,
कभी मिले तुम,तोह एहसास यह ज़रूर कराऊंगा,
की तुम्ही से था प्यार,तुम्ही से ही रहेगा,
यह दिल तब भी तुम्हारा था,और हमेशा तुम्हारा ही रहेगा,
अब आखें नम है और दिल भर आया है,
न जाने क्यूँ यह मन फिर बीता वक्त ,नजरो के सामने लाया है,
न जाने क्यूँ यह बीता वक्त,नजरो के सामने लाया है??????????????????????
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