लो एक और शाम ढल गयी,
रुख-ए-ज़िन्दगी थोड़ी और बदल गयी,
अभी तोह शुरू हुआ था कारवां,
और अभी मंज़िलें भी बदल गई।
यार मिले कुछ नए पुराने,
थे अपने अपने जिनके फ़साने,
कोई करता था बात बीते वक़्त की,
कोई समझाता था नए अफ़साने।
वक़्त कैसे गुज़रा पता भी न चला,
अभी तोह आया ही था मैं,
और लो अभी चल भी दीया।
पर यह सिर्फ इस कारवां का अंत है,
यारी हमारी जारी रहेगी,
किस्से कहानियों का याराना है हमारा,
बातें अधूरी थी,
बातें अधूरी रहेंगी।
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