लाखों हैं मुस्कुराहटें चेहरे पर मेरे ,
आँखों की कसक बत्लायुं तोह कैसे, ,
दुनिया से तोह झूठ बोल सकता हूँ मैं,
सच खुद से छुपाऊं तोह कैसे।।
जब सूरज में तपिश है वही,
पानी की नमी ने भी उसका साथ छोड़ा नहीं ,
फिर क्यूँ बदल गई तुम,
खो दिया मैंने भी खुद को कहीं।।
कैसे मजबूरी आज ये आई है,
रात पर कालिक सी जैसे छाई है,
शोर से ज्यादा चुभता यह सन्नाटा है,
अपनी खुदी की क्या सज़ा मैंने पायी है।।
उलझ गयी है तू दुनिया में इस कदर,
शायद न पहुंचे तुझ तक मेरे जनाज़े की भी खबर,
लावारिस खड़ी है मेरी मोहब्बत आज यहाँ ,
जैसे बेआबरू हो गयी है नज़र।।
वक़्त का भी यह कैसा मोड़ आया है,
मैं चाहकर भी कुछ समझा नहीं सकता,
तुझे अपना कह तोह सकता हूँ,
पर तुझे अपना बना नहीं सकता।।
आँखों की कसक बत्लायुं तोह कैसे, ,
दुनिया से तोह झूठ बोल सकता हूँ मैं,
सच खुद से छुपाऊं तोह कैसे।।
जब सूरज में तपिश है वही,
पानी की नमी ने भी उसका साथ छोड़ा नहीं ,
फिर क्यूँ बदल गई तुम,
खो दिया मैंने भी खुद को कहीं।।
कैसे मजबूरी आज ये आई है,
रात पर कालिक सी जैसे छाई है,
शोर से ज्यादा चुभता यह सन्नाटा है,
अपनी खुदी की क्या सज़ा मैंने पायी है।।
उलझ गयी है तू दुनिया में इस कदर,
शायद न पहुंचे तुझ तक मेरे जनाज़े की भी खबर,
लावारिस खड़ी है मेरी मोहब्बत आज यहाँ ,
जैसे बेआबरू हो गयी है नज़र।।
वक़्त का भी यह कैसा मोड़ आया है,
मैं चाहकर भी कुछ समझा नहीं सकता,
तुझे अपना कह तोह सकता हूँ,
पर तुझे अपना बना नहीं सकता।।
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